होलिका दहन की तिथि पर मतभेद : 2 या 3 मार्च? जानिए ज्योतिषाचार्य का निर्णय
02 मार्च को होगा होलिका दहन : डॉ श्याम मनोहर चतुर्वेदी
सागर। बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं सिया-भवानी पंचांग व कैलेंडर के गणित कर्ता डॉ श्याम मनोहर चतुर्वेदी ने बताया है कि विभिन्न धार्मिक ग्रंथो की मान्यता एवं निर्णय अनुसार होलिका दहन प्रदोषकाल व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भद्राकाल को छोड़कर किया जाता है। सा प्रदोष व्यापिनी भद्रा रहित ग्राहा ( धर्म सिंधु) यदि फाल्गुन पूर्णिमा 2 दिन प्रदोषकाल व्यापिनी रहती है तो या पूर्णिमा तिथि दूसरे दिन प्रदोषकाल के पहले समाप्त हो जाती है तो इन दोनों परिस्थितियों में होलिका दहन भद्रामुख छोड़कर पहले दिन ही किया जाता है। यह पहला मत है। जबकि दूसरे मत के अनुसार दूसरे दिन पूर्णिमा प्रदोषकाल को बिल्कुल भी स्पर्श न करें किंतु साढे तीन प्रहर से अधिक हो एवं प्रतिपदा तिथि वृद्धि गामनी हो तो दूसरे दिन प्रदोषकाल व्यापिनी प्रतिपदा मैं ही होलिका का दहन करना चाहिए। इस वर्ष ऐसी स्थिति बन रही है। इस वर्ष 2 मार्च दिन सोमवार को फाल्गुन पूर्णिमा सायं 5 बजकर 56 मिनट पर प्रवेश हो रही है जो 3 मार्च दिन मंगलवार की सायं 5 बजकर 08 तक व्याप्त रहेगी। 3 मार्च दिन मंगलवार को पूर्णिमा तिथि प्रदोषकाल का बिल्कुल भी स्पर्श नहीं कर रही है जबकि 2 मार्च सोमवार को फाल्गुन पूर्णिमा तिथि प्रदोषकाल व्यापिनी है किंतु इस दिन भद्रा पूर्णिमा प्रवेश समय 5:56 के साथ ही प्रारंभ हो रही है जो रात्रिअंत 05:28 तक रहेगी। 03 मार्च को पूर्णिमा तिथि साढ़े तीन प्रहर से अधिक है और प्रतिपदा तिथि वृद्धि गामनी है। 03 मार्च को चंद्रग्रहण भी है जो रात्रि 06 बजकर 22 मिनट से प्रारंभ होकर रात्रि 06 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगा। सागर में चन्द्र ग्रहण केवल 24 मिनट 19 सेकेंड ही रहेगा। चंद्रग्रहण का सूतक 03 मार्च की सुबह 09 बजकर 31 मिनट पर प्रारंभ होगा। उज्जैन में पंचांग कर्ताओं की बैठक में पहले मत को ही प्राथमिकता दी है इसलिए 02 मार्च को ही भद्रामुख छोड़ कर अर्थात रात्रि 07 बजकर 32 के बाद होलिका दहन किया जाएगा। जबकि दूसरे मत के अनुसार होलिका दहन 03 मार्च की रात्रि चन्द्र ग्रहण के पश्चात अर्थात रात्रि 06 बजकर 46 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट के मध्य होगा। क्षेत्रीय परंपरा में लोग निशीथ काल में या उसके बाद होलिका दहन करते हैं किन्तु शास्त्रों में प्रदोषकाल में ही होलिका दहन करने की शास्त्रों ने आज्ञा दी है।








