वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में आने को तैयार चीते लेकिन अधूरी पड़ी है विस्थापन की प्रक्रिया कहीं बने न द्वंद्व की स्थिति – कूनो में टाइगर रिजर्व भेजने की तैयारी भी पूरी
जून माह में टाइगर रिजर्व आएंगे चीते अभी भी कई गांवों का नहीं हो पाया है विस्थापन चीतों को बसाने प्रबंधन कर रहा तैयारी
विशाल रजक तेंदूखेड़ा!- वीरांगना रानी दुर्गावती (नौरादेही) टाइगर रिजर्व में चीतों को बसाने की तैयारी तेज हो गई है. अपने जन्मदिन के दिन मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने चीतों को बसाने के लिए बनाए जा रहे बाड़े का भूमि पूजन किया था. इसके बाद बाड़े के निर्माण का कार्य शुरू हो गया है. मुख्यमंत्री पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि जुलाई माह में नौरादही टाइगर रिजर्व में चीते छोड़े जाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या नौरादेही टाइगर रिजर्व चीतों को बसाने के लिहाज से पूरी तरह महफूज है क्योंकि नौरादेही टाइगर रिजर्व में विस्थापन की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है हालांकि नौरादेही टाइगर रिजर्व प्रबंधन का कहना है कि विस्थापन प्रक्रिया के लंबित होने से चीतों की सुरक्षा या मानव द्वंद्व की स्थिति बनने की संभावना नहीं है. जहां तक विस्थापन की बात है, तो प्रक्रिया नियमानुसार चल रही है और उसमें समय लगता है अभी आधे से ज्यादा गांवों का विस्थापन बाकी जहां तक नौरादेही टाइगर रिजर्व में मौजूद गांव के विस्थापन की बात करें तो विस्थापन 2014 में शुरू हो गई थी, लेकिन अभी तक पूरी नहीं हो पाई है. नौरादेही टाइगर रिजर्व दमोह सागर और नरसिंहपुर जिले तक फैला हुआ है. टाइगर रिजर्व के अंदर 93 गांव मौजूद हैं, जिनको विस्थापित किया जाना है. हालांकि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत इन गांवों को जबरन स्थापित नहीं किया जा सकता है ऐसे में विस्थापन की प्रक्रिया काफी धीमी गति से चलती है. अभी तक 93 गांव में से सिर्फ 43 गांव पूरी तरह विस्थापित हो पाए हैं. 50 गांव के विस्थापन की प्रक्रिया पूरी हो गई है, लेकिन अभी यह गांव खाली नहीं हुए हैं और 43 गांव की विस्थापन की प्रक्रिया प्रचलन में है. विस्थापन ना होने के खतरे जब नौरादेही टाइगर रिजर्व चीतों के तीसरे घर के रूप में स्थापित किया जा रहा है, तब विस्थापन प्रक्रिया पूरी न होने की स्थिति में कई तरह के खतरों की आशंका लगाई जा रही है. माना जा रहा है कि चीतों को बसाने वाली जगह पर अगर इंसानी दखल रहा, तो चीतों के रहवास और नौरादेही के माहौल में अनुकूल होने की कोशिश प्रभावित भी हो सकती है. वहीं अगर इंसान जंगल के भीतर ही रहता है, तो चीता उन पर हमला कर सकता है चीतों और इंसानों के बीच द्वंद्व की स्थिति बन सकती है. इसके अलावा वन अपराध को अंजाम देने वाले शिकारी और तस्कर चीतों के लिए खतरनाक हो सकते हैं. क्योंकि इंसानी दखल रहा तो अपराधियों की पहचान मुश्किल होगी. चीता प्रोजेक्ट के विशेषज्ञों ने भी की थी सिफारिश चीता प्रोजेक्ट के विशेषज्ञों ने जब अप्रैल 2025 में नौरादेही टाइगर रिजर्व में चीतों को बसाए जाने की संभावना का अध्ययन किया था, तो उन्होंने कुछ सिफारिश की थी. जिनमें विस्थापन की प्रक्रिया जल्दी से जल्दी निपटने की बात कही गई थी. वहीं चीतों की बसाहट के आसपास इंसानी दखल कम से कम हो, इसके लिए पूरे इंतजाम करने के लिए कहा था। चीतों को विस्थापन से न जोड़ें
टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार ने कहा कि ये समझना जरूरी है कि विस्थापन गांव का हो रहा है. विस्थापना का सीधे तौर पर चीतों को बसाने से कोई संबंध नहीं है. वनग्रामों का विस्थापन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत होता है. अधिनियम के तहत वन्यजीव अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यान में विस्थापना जरूरी है, लेकिन ये अनिवार्य नहीं है. जब गांव के लोग चाहेंगे, तभी विस्थापना होगा. हम उनसे सामूहिक और व्यक्तिगत आवेदन लेते हैं ऐसा भी हो सकता है कि गांव के 90 से 95 प्रतिशत लोग विस्थापन के लिए तैयार हो जाएं, लेकिन बाकी बचे जाने के लिए तैयार ना हो. ऐसे में उन्हें जबरन विस्थापित नहीं किया जा सकता है, लेकिन विस्थापन को चीतों से नहीं जोड़े जाना चाहिए. जहां तक चीतों और इंसानों को खतरे की बात है, तो मैं बताना चाहूंगा कि चीतों से इंसानों को शून्य खतरा है. मैं ये बात पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं. कूनो में चीतों को आए लगभग 4 साल हो चुके हैं, 2022 में वहां पर चीते आए थे. वहां भी इंसानी दखल काफी ज्यादा है, पर चीता ने अभी तक किसी पर अटैक नहीं किया है. अफ्रीका में लगभग 7 हजार चीते हैं, लेकिन वहां इंसान पर हमले की सिर्फ एक घटना सामने आयी है. जहां एक व्यक्ति चीते के बाड़े में घुसकर उसे परेशान कर रहा था, तो चीते ने उसे मार दिया. चीता किसी भी स्थिति में हमला नहीं करता है. यदि आप घर के पालतू जानवरों को भी परेशान करेंगे, तो वो भी हमला करते हैं
5500 वर्ग किमी में तैयार हो रहा नया चीता आवास
टाइगर रिजर्व में लगभग 5500 वर्ग किमी में फैला प्रदेश का सबसे बड़ा वन्यजीव अभयारण्य है पिछले दो वर्षों से इसे चीता आवास के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां शिकार आधार, निगरानी और प्रबंधन व्यवस्था तैयार हो चुकी है। विशेष बाड़ों का निर्माण अंतिम चरण में है। मानसून से पहले टीकाकरण के दौरान चीतों को पकड़कर शिफ्ट करने की योजना बनाई गई है








