संतान सप्तमी : भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इसे संतान सुख, संतान की लंबी उम्र और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना का पर्व माना जाता है। खासकर माताएँ इस दिन उपवास रखकर अपनी संतान की रक्षा और खुशहाली के लिए भगवान सूर्य और माता पार्वती से प्रार्थना करती हैं।
क्यों मनाई जाती है संतान सप्तमी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा और नियम से व्रत करने पर संतान पर आने वाले संकट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
पूजन विधि और परंपरा
इस दिन प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है।
घर में कलश स्थापना कर भगवान सूर्य और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
महिलाएँ व्रत रखकर कथा श्रवण करती हैं और संतान की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।
सूर्य देव को जल अर्पित करना इस व्रत का मुख्य हिस्सा माना जाता है।
उद्देश्य
संतान सप्तमी का मुख्य उद्देश्य केवल संतान सुख की प्राप्ति ही नहीं, बल्कि बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन में प्रगति के लिए आशीर्वाद पाना है। यह पर्व मातृत्व की भावना और संतान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है।
सामाजिक महत्व
यह व्रत सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माता-पिता के उस गहरे संबंध को भी दर्शाता है जिसमें वे अपने बच्चों के लिए हर कठिनाई सहने को तैयार रहते हैं। समाज में यह पर्व हमें संतान के पालन-पोषण और उनके उज्ज्वल भविष्य के महत्व की याद दिलाता है।