भाद्रपद अमावस्या पर पितृ तर्पण, दान-पुण्य और पूजा-पाठ का विशेष महत्व, 11 सितंबर को कुशा संग्रह के लिए माने गए हैं शुभ मुहूर्त
भाद्रपद माह की अमावस्या को धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है। इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पण, दान-पुण्य और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। भाद्रपद अमावस्या को कुशोत्पाटिनी, कुशग्रहणी और पिठौरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन धार्मिक कार्यों में उपयोग होने वाली कुशा एकत्रित करने की परंपरा है। मान्यता है कि अमावस्या के दिन संग्रह की गई कुशा का उपयोग लंबे समय तक धार्मिक कार्यों में किया जा सकता है।
भाद्रपद माह भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से जुड़ा होने के कारण इस अमावस्या का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। कर्मकांड और आध्यात्मिक परंपराओं में कुशा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसका वैज्ञानिक नाम Eragrostis cynosuroides बताया गया है। इसे कांस अथवा ढाब के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में कुशा को अमृत तत्व से युक्त माना गया है।
कर्मकांड ज्योतिष विशेषज्ञ डॉ. अनिल दुबे वैदिक के अनुसार, कुशा अत्यंत पवित्र मानी जाती है और इसी कारण इसे ‘पवित्री’ भी कहा जाता है। इसके पत्तों के सिरे नुकीले होते हैं, इसलिए इसे उखाड़ते समय सावधानी बरतना जरूरी माना गया है। परंपरा के अनुसार कुशा जड़ सहित निकाली जानी चाहिए और इस दौरान हाथ में चोट न लगे, इसका भी ध्यान रखा जाता है। ‘कुशल’ शब्द की उत्पत्ति को भी इसी सावधानी से जोड़कर देखा जाता है।
इस वर्ष कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर कुशा संग्रह के लिए 11 सितंबर का दिन माना गया है। कुशा संग्रह के लिए पूर्वाह्न का समय प्रमुख माना जाता है।
अमावस्या पर किए जाने वाले धार्मिक कार्य
अमावस्या की तिथि स्नान, दान और पितृ तर्पण के लिए विशेष मानी जाती है। भाद्रपद कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर परंपरा के अनुसार कई धार्मिक कार्य किए जाते हैं।
सुबह स्नान के लिए नदी, जलाशय या कुंड पर जाने की परंपरा है। स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देने और बहते जल में तिल प्रवाहित करने का विधान बताया गया है।
पितरों की आत्मशांति के लिए नदी के किनारे पिंडदान किया जाता है। इसके साथ ही जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने की परंपरा है।
इस दिन कालसर्प दोष निवारण के लिए पूजा-अर्चना भी की जा सकती है। शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर पितरों का स्मरण करने और पीपल की सात परिक्रमा करने की मान्यता है।
अमावस्या को शनिदेव से भी जोड़ा जाता है, इसलिए इस दिन शनिदेव की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
पूजा में कुशा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार कुशा के बिना पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता। भाद्रपद अमावस्या पर कुशा एकत्र करने की परंपरा के कारण ही इसे कुशग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है।
शास्त्रों में कुशा के दस प्रकार बताए गए हैं—
कुशा, काशा, यवा, दूर्वा, उशीर, सकुन्दका, गोधूमा, ब्राह्मयो, मौन्जा और दर्भ।
मान्यता है कि इन दस प्रकार की घास में से जो भी आसानी से उपलब्ध हो, उसे इस दिन एकत्र किया जा सकता है। कुशा को हाथ से ही एकत्र करने की परंपरा बताई गई है। इसकी पत्तियां पूरी होनी चाहिए और आगे का हिस्सा टूटा हुआ नहीं होना चाहिए। इसके लिए सूर्योदय का समय उचित माना गया है।
हालांकि ऐसी कुशा का प्रयोग धार्मिक कार्यों में नहीं किया जाता जिसका मूल अत्यधिक नुकीला हो, अग्रभाग कटा हुआ हो या जो हरी अवस्था में हो। ऐसी कुशा को देव और पितृ दोनों कार्यों के लिए वर्जित बताया गया है।
इस विधि से उखाड़ने की परंपरा
अमावस्या के दिन दर्भस्थल पर जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठने की परंपरा है। कुशा उखाड़ने से पहले मंत्र पढ़कर प्रार्थना की जाती है—
कुशाग्रे वसते रुद्र: कुश मध्ये तु केशव:।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी।।
इसके बाद—
विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव।।
मंत्रोच्चार के बाद “ऊँ हूँ फट्” मंत्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ से कुशा उखाड़ने की परंपरा बताई गई है। मान्यता के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन एकत्र की गई कुशा का उपयोग पूरे वर्ष होने वाले पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जा सकता है।
सीता जी से भी जुड़ी है कुशा की पौराणिक कथा
कुशा को लेकर एक पौराणिक मान्यता यह भी है कि इसका संबंध पृथ्वी लोक के बजाय अंतरिक्ष से माना जाता है। कथा के अनुसार जब माता सीता पृथ्वी में समा रही थीं, तब भगवान राम ने उन्हें रोकने के लिए दौड़कर प्रयास किया। इस दौरान उनके हाथ में सीता जी के कुछ केश आ गए। मान्यता है कि यही केश आगे चलकर कुशा के रूप में परिवर्तित हुए।
पौड़ी गढ़वाल के सीतोनस्यूं क्षेत्र में वह स्थान माना जाता है जहां माता सीता धरती में समाई थीं। वहां आसपास की घास को आज भी नहीं काटे जाने की परंपरा बताई जाती है।
भारत में हिंदू धार्मिक परंपराओं में कुशा का इस्तेमाल पूजा, श्राद्ध और तर्पण जैसे कार्यों में किया जाता है। श्राद्ध और तर्पण में कुशा को आवश्यक माना गया है।
पूजा या तर्पण के दौरान कुशा से बनी अंगूठी यानी पवित्री अनामिका उंगली में धारण करने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार प्रतिदिन नई कुशा ली जाती है, जबकि अमावस्या के दिन तोड़ी गई कुशा एक महीने तक और भाद्रपद अमावस्या पर एकत्र की गई कुशा पूरे वर्ष तक उपयोग में लाई जा सकती है। इसी कारण लोग इस दिन कुशा एकत्र करके सुरक्षित रखते हैं।
केतु शांति में भी कुशा का प्रयोग
केतु शांति से जुड़े धार्मिक विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा से दी जाने वाली आहुतियों का विशेष उल्लेख मिलता है। रातभर पानी में भिगोकर रखी गई कुशा के जल का इस्तेमाल कलश स्थापना, देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म और दशविध स्नान जैसे धार्मिक कार्यों में किया जाता है।
धार्मिक मान्यता में केतु को अध्यात्म और मोक्ष का कारक माना गया है। देव पूजा में इस्तेमाल की गई कुशा को दोबारा उपयोग किया जा सकता है, लेकिन पितृ और प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा को अपवित्र माना जाता है।
देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत और ग्रहशांति जैसे अनुष्ठानों में रुद्र कलश तथा वरुण कलश में जल भरने के बाद कुशा डालने की परंपरा है। इसके पीछे एक वैज्ञानिक पक्ष भी बताया जाता है, जिसके अनुसार कलश के जल में कुशा रखने से पानी लंबे समय तक जीवाणुओं से मुक्त रहने में मदद मिलती है।
पूजा के दौरान यजमान अनामिका उंगली में कुशा से बनी नागमुद्रिका भी धारण करते हैं।
कुशा के आसन की भी है विशेष मान्यता
धार्मिक अनुष्ठानों में कुश यानी दर्भ घास से तैयार आसन का इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा-पाठ और साधना से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकने में कुश का आसन सहायक होता है। इसे विद्युत कुचालक के रूप में भी बताया गया है।
मान्यता है कि कुशा के आसन पर बैठकर साधना करने से आरोग्य, लक्ष्मी, यश और तेज की वृद्धि होती है तथा साधक की एकाग्रता बनी रहती है। जिन लोगों की राशि पर ग्रहण का प्रभाव माना जाता है, उनके लिए कुशा की पवित्री धारण करने की बात भी कही गई है।
कुशा की जड़ से बनी माला से जाप करने पर उंगलियों के एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव पड़ता है, जिससे रक्त संचार ठीक रहने की मान्यता है।
कुश के आसन पर बैठकर मंत्र जाप करने से मंत्र सिद्ध होने की भी धार्मिक मान्यता है। देवी भागवत के 19/32 में उल्लिखित— “नास्य केशान् प्रवपन्ति, नोरसि ताडमानते।” —का संदर्भ देते हुए कुश धारण करने के विभिन्न लाभ बताए गए हैं। वेदों में भी कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु बढ़ाने वाली तथा वातावरण को शुद्ध रखने और संक्रमण रोकने में सहायक बताया गया है।
अमृत कलश से जुड़ी कुशा की कथा
कुशा को लेकर एक अन्य पौराणिक कथा अमृत कलश से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार अमृत कलश को कुश के आसन पर रखा गया था। इसी कारण कुशा का संबंध अमृत से भी माना जाता है।
कथा के अनुसार कद्रू और विनता की संतानें होने के कारण नाग और गरुड़ सौतेले भाई थे। कद्रू ने छल से विनता को अपनी दासी बना लिया था। नागों ने गरुड़ के सामने शर्त रखी कि यदि वह स्वर्ग से उनके लिए अमृत लेकर आएगा तो वे उसकी मां विनता को दासता से मुक्त कर देंगे।
गरुड़ अमृत लेने स्वर्ग पहुंचे और वहां उनका देवताओं से युद्ध हुआ। इस संघर्ष में इंद्र भी मूर्छित हो गए। गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनाया। गरुड़ ने उनसे अमर रहने का वरदान भी मांगा।
जब गरुड़ अमृत लेकर धरती की ओर लौट रहे थे, तब इंद्र ने वज्र से उन पर प्रहार किया। अमरता के वरदान के कारण गरुड़ पर इसका असर नहीं हुआ। गरुड़ ने दधीचि की हड्डियों से बने वज्र के सम्मान में अपना एक पंख इंद्र को अर्पित किया।
इंद्र ने गरुड़ को समझाया कि यदि अमृत नागों के हाथ लग गया तो वे इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। गरुड़ ने अपनी मां को दासता से मुक्त कराने की इच्छा जताई और कहा कि वह अमृत को जहां रखेगा, इंद्र वहां से उसे ले सकते हैं।
गरुड़ की बात से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें वर मांगने को कहा। गरुड़ ने वर मांगा कि जिन नागों ने उनकी मां को दासी बनाया है, वे सभी उनके भोजन बनें।
इसके बाद गरुड़ नागों के पास पहुंचे और अमृत सौंपने से पहले अपनी मां को दासता से मुक्त कराने की बात कही। नागों ने उनकी मां को मुक्त कर दिया। गरुड़ ने अमृत कलश को कुश के आसन पर रख दिया और नागों से कहा कि स्नान आदि करके पवित्र होने के बाद वे अमृत ग्रहण कर सकते हैं।
नाग स्नान के लिए चले गए। इसी बीच इंद्र वहां पहुंचे और अमृत कलश लेकर स्वर्ग लौट गए। जब नाग वापस आए तो उन्हें कलश नहीं मिला। बाद में उन्हें लगा कि संभव है कुश के आसन पर अमृत की कुछ बूंदें गिरी हों। उन्होंने कुशा को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। मान्यता है कि कुश के कारण उनकी जीभ बीच से दो हिस्सों में बंट गई। अमृत कलश के स्पर्श के बाद से ही कुश को अत्यंत पवित्र माना जाने लगा।
कुशा की पवित्री क्यों धारण की जाती है?
धार्मिक विधान में कुशा से बनी अंगूठी अनामिका उंगली में पहनने की परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि हाथ से संचित आध्यात्मिक ऊर्जा अन्य उंगलियों के रास्ते बाहर न जाए। अनामिका को सूर्य की उंगली माना जाता है और सूर्य से जीवनी शक्ति, तेज तथा यश प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।
कुशा को धारण करने का एक उद्देश्य आध्यात्मिक ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना भी बताया गया है। कर्मकांड के दौरान यदि अनजाने में हाथ जमीन से स्पर्श कर जाए तो कुशा बीच में रहती है। इसी कारण पूजा के समय हाथ में कुश धारण करने की परंपरा बताई गई है।
पिठौरी अमावस्या का भी विशेष महत्व
भाद्रपद अमावस्या को पिठौरी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने इसी दिन इंद्राणी को इस व्रत का महत्व बताया था।
विवाहित महिलाएं संतान प्राप्ति और अपनी संतान के सुख-समृद्धि तथा कुशल-मंगल की कामना से इस दिन उपवास रखती हैं और देवी दुर्गा की पूजा करती हैं।
अमावस्या तिथि और कुशा संग्रह के शुभ मुहूर्त
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे से।
अमावस्या तिथि समाप्त: 11 सितंबर को सुबह 08:56 बजे।
कुशा एकत्र करने के बताए गए मुहूर्त:
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:25 से 5:05 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:53 से 12:43 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 2:23 से 3:14 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 6:32 से 6:55 बजे तक
कर्मकांड ज्योतिष विशेषज्ञ डॉ. अनिल दुबे वैदिक, देवरी बिछुआ — 9936443138








