राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस तकनीकी आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक : नए भारत की वैज्ञानिक उड़ान
आलेख : आरंभ शुक्ला
इक्कीसवीं सदी का विश्व विज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी की शक्ति से संचालित हो रहा है। आज किसी भी राष्ट्र की वैश्विक प्रतिष्ठा केवल उसकी जनसंख्या, भूभाग या सैन्य क्षमता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कितना सक्षम, आत्मनिर्भर और नवाचारी है। ऐसे समय में भारत का राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है, जिसने भारत को तकनीकी पराधीनता से निकालकर आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाया है।
11 मई 1998 को पोखरण में हुए सफल परमाणु परीक्षणों ने विश्व को यह स्पष्ट संदेश दिया था कि भारत अब तकनीकी रूप से आत्मविश्वासी राष्ट्र बन चुका है। यह केवल परमाणु शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक क्षमता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की उद्घोषणा थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा घोषित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस आज उसी वैज्ञानिक चेतना का राष्ट्रीय उत्सव बन चुका है।
बीते वर्षों में भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिस तीव्र गति से प्रगति की है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि दूरदृष्टि, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक प्रतिभा का समन्वय हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद विश्व मंच पर नई पहचान स्थापित की जा सकती है। आज भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, अर्धचालक निर्माण और नवप्रवर्तन आधारित स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती उपस्थिति विश्व का ध्यान आकर्षित कर रही है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा संचालित चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 जैसी उपलब्धियों ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। कम लागत में सफल अंतरिक्ष अभियानों ने भारतीय वैज्ञानिक क्षमता को विश्वसनीयता और सम्मान प्रदान किया है। यह वही भारत है जिसने कभी विदेशी तकनीक पर निर्भर होकर विकास की शुरुआत की थी और आज वही देश अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल भुगतान तक विश्व को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
डिजिटल क्रांति ने भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। एकीकृत भुगतान अंतरफलक (यूपीआई) ने डिजिटल भुगतान को आम नागरिक के जीवन का हिस्सा बना दिया है। आज छोटे दुकानदार से लेकर ग्रामीण किसान तक डिजिटल लेन-देन कर रहा है। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और शासन व्यवस्था को आम जनता के द्वार तक पहुँचा दिया है। “डिजिटल इंडिया” अभियान ने तकनीक को महानगरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गाँवों तक डिजिटल अवसरों का विस्तार किया है। यही कारण है कि भारत आज विश्व के सबसे बड़े डिजिटल समाजों में गिना जाने लगा है।
रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। स्वदेशी मिसाइल प्रणाली, आधुनिक लड़ाकू विमान, ड्रोन तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भारत तेजी से प्रगति कर रहा है। “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत अभियान” जैसे प्रयासों ने रक्षा उत्पादन को नई दिशा दी है। भारत अब केवल हथियार आयात करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि रक्षा उपकरणों के निर्यात की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा चुका है। यह परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ आर्थिक विकास और तकनीकी नवाचार को भी गति प्रदान कर रहा है।
हालाँकि तकनीकी प्रतिस्पर्धा के कुछ अत्याधुनिक क्षेत्रों में भारत अभी अमेरिका, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और इज़राइल जैसे देशों से पीछे है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, अर्धचालक निर्माण और उन्नत साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में इन देशों की तकनीकी बढ़त स्पष्ट दिखाई देती है। अमेरिका और चीन वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा सुपरकंप्यूटिंग की दौड़ में अग्रणी हैं, जबकि दक्षिण कोरिया और ताइवान अर्धचालक उत्पादन के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। जापान रोबोटिक्स में विश्व नेतृत्व कर रहा है और इज़राइल साइबर सुरक्षा तथा रक्षा तकनीक में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। भारत के सामने चुनौती केवल इन देशों की बराबरी करना नहीं, बल्कि अपनी विशाल युवा शक्ति और प्रतिभा को तकनीकी ऊर्जा में परिवर्तित करना है।
यदि भारत को वास्तविक अर्थों में तकनीकी महाशक्ति बनना है, तो अनुसंधान एवं विकास पर निवेश बढ़ाना होगा। वर्तमान में भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7 प्रतिशत ही अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है, जबकि विकसित देश इस क्षेत्र में कहीं अधिक निवेश कर रहे हैं। विश्वस्तरीय तकनीकी विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग–शिक्षा सहयोग को मजबूत बनाना समय की आवश्यकता है। अर्धचालक निर्माण इकाइयों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान केंद्रों और नवाचार आधारित उद्योगों को दीर्घकालिक नीति समर्थन देना होगा। साथ ही ग्रामीण भारत तक 5जी नेटवर्क, डिजिटल अवसंरचना और तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार भी अनिवार्य है।
प्रौद्योगिकी का विस्तार केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार सृजन का भी सबसे बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। वर्तमान में भारत का सूचना प्रौद्योगिकी एवं व्यवसाय प्रक्रिया प्रबंधन क्षेत्र लगभग 54 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रहा है। डिजिटल सेवाएँ, ई-वाणिज्य, साइबर सुरक्षा, आँकड़ा विश्लेषण, ऑनलाइन शिक्षा, ड्रोन संचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में लाखों नए रोजगार उत्पन्न हो रहे हैं। भारत का डिजिटल और नवप्रवर्तन आधारित तंत्र प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों युवाओं की आजीविका का आधार बन चुका है। गिग अर्थव्यवस्था, स्वतंत्र कार्य प्रणाली और डिजिटल मंच आधारित सेवाओं ने ग्रामीण युवाओं के लिए भी नए अवसरों के द्वार खोले हैं।
ग्रामीण भारत में कॉमन सर्विस सेंटर, डिजिटल बैंकिंग, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन विपणन और कृषि तकनीक ने आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा दी है। आज ग्रामीण युवा मोबाइल रिपेयरिंग, डिजिटल कंटेंट निर्माण, ई-कॉमर्स डिलीवरी, ऑनलाइन सेवाओं और स्वतंत्र कार्य के माध्यम से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में ड्रोन तकनीक, मौसम आधारित सूचना प्रणाली और ऑनलाइन बाजारों ने किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा है। यदि सरकार कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा को ग्रामीण क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से पहुँचा सके, तो प्रौद्योगिकी भारत की बेरोजगारी समस्या को काफी हद तक कम कर सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था ट्रिलियन डॉलर स्तर तक पहुँच सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, रोबोटिक्स, अर्धचालक, साइबर सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं के विस्तार से आने वाले वर्षों में करोड़ों नए रोजगार उत्पन्न होने की संभावना है। विभिन्न आर्थिक और औद्योगिक अध्ययनों के अनुसार भविष्य में भारत में उत्पन्न होने वाले कुल नए रोजगारों का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों से आ सकता है। यदि भारत अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और डिजिटल अवसंरचना पर निरंतर निवेश बढ़ाता है, तो यह प्रतिशत और अधिक बढ़ सकता है।
हालाँकि तकनीकी विकास के साथ यह भी आवश्यक है कि मानव मूल्यों और सामाजिक संतुलन को बनाए रखा जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के बढ़ते प्रभाव के बीच कौशल विकास तथा पुनः प्रशिक्षण की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। तकनीक का उद्देश्य केवल मशीनों की दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, सरल और सम्मानजनक बनाना होना चाहिए।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस हमें यह संदेश देता है कि विज्ञान और तकनीक केवल विकास के साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और भविष्य की शक्ति हैं। जिस देश ने सीमित संसाधनों में पोखरण, चंद्रयान और डिजिटल क्रांति जैसे इतिहास रचे हों, वह भविष्य में वैश्विक तकनीकी नेतृत्व भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि भारत अपनी युवा शक्ति, वैज्ञानिक प्रतिभा और नवाचार क्षमता को सही दिशा में संगठित करे। यदि यह संकल्प मजबूत रहा, तो आने वाला समय निश्चित रूप से भारत को विश्व की अग्रणी तकनीकी महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।
आलेख: पंडित आरंभ शुक्ला








