आज से भगवान विष्णु योगनिद्रा में, शुरू हुआ चातुर्मास… जानिए क्यों रुक जाते हैं सभी मांगलिक कार्य
एकादशी तिथि प्रारम्भ 24 जुलाई को सायं 10:28 बजे से।
एकादशी तिथि समाप्त 25 जुलाई को दोपहर 12:18 बजे।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने तक पाताल में शयन करते हैं। ये चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। चातुर्मास को भगवान की भक्ति करने का समय बताया गया है। इस दौरान कोई मांगलिक कार्य भी नहीं किए जाते।
डॉ अनिल दुबे वैदिक बताते हैं कि
इसके दौरान जितने भी पर्व, व्रत, उपवास, साधना, आराधना, जप-तप किए जाते हैं उनका विशाल स्वरूप एक शब्द में ‘चातुर्मास्य’* कहलाता है। चातुर्मास से चार मास के समय का बोध होता है और चातुर्मास्य से इस समय के दौरान किए गए सभी पर्वों का समग्र बोध होता है।
पुराणों में इस चौमासे* का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। भागवत में इन चार माहों की तपस्या को एक यज्ञ की संज्ञा दी गई है। वराह पुराण में इस व्रत के बारे में कुछ उदारवादी बातें भी बताई गई हैं।
*शास्त्रों व पुराणों* में इन चार माहों के लिए कुछ विशिष्ट नियम बताए गए हैं। इसमें चार महीनों तक अपनी रुचि व अभीष्ठानुसार नित्य व्यवहार की वस्तुएं त्यागना पड़ती हैं। कई लोग खाने में अपने सबसे प्रिय व्यंजन का इन माहों में त्याग कर देते हैं। चूंकि यह विष्णु व्रत है, इसलिए चार माहों तक सोते-जागते, उठते-बैठते ‘ॐ नमो नारायणाय’ के जप की अनुशंसा की गई है।
इन चार माहों के दौरान *शादी-विवाह, उपनयन संस्कार व अन्य मंगल कार्य वर्जित* बताए गए हैं। चार मास की अवधि के पश्चात देवोत्थान एकादशी को भगवान जागते हैं।
पौराणिक महत्त्व
पुराणों के अनुसार बलि नाम के राजा ने तीनो लोकों पर अधिकार कर लिया था। इसलिए इंद्र घबरा कर विष्णु जी के पास गए और उनसे सहायता मांगी। देवराज इंद्र के विनती करने पर विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि से दान मांगने पहुंच गए। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि ने उन्हें तीन पग भूमि दान में देने के लिए हाँ कर दी। परन्तु भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर के दो पग में धरती और आकाश नाप लिया और तीसरा पग कहां रखे जब यह पूछा तो बलि ने कहा कि उनके सिर पर रख दें। इस तरह विष्णु जी ने बलि का अभिमान तोड़ा तथा तीनो लोकों को बलि से मुक्त करवा दिया।
राजा बलि की दानशीलता और भक्ति भाव देखकर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने बलि से वर मांगने के लिए कहा। बलि ने वरदान मांगते हुए विष्णु जी से कहा कि आप मेरे साथ पाताल चलें और हमेशा वहीं निवास करें। भगवान विष्णु ने बलि को उसकी इच्छा के अनुसार वरदान दिया तथा उसके साथ पातल चले गए। यह देखकर सभी देवी देवता और देवी लक्ष्मी चिंतित हो उठे।
देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को पाताल लोक से वापिस लाना चाहती थी। इसलिए उन्होंने एक चाल चली। देवी लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया तथा राजा बलि के पास पहुँच गयी। राजा बलि के पास पहुँचने के बाद उन्होंने राजा बलि को राखी बाँध कर अपना भाई बना लिया और बदले में भगवान विष्णु को पाताल से मुक्त करने का वचन मांग लिया।
भगवान विष्णु अपने भक्त को निराश नही करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बलि को वरदान दिया कि वह हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में निवास करेंगे।
यही कारण है कि इन चार महीनो में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और उनका वापन रूप में भगवान का अंश पाताल लोक में होता है।
डॉ अनिल दुबे वैदिक देवरी बिछुआ 9936443138








