सागर के बाघराज मंदिर में वर्षों पुरानी परंपरा, जवारे और घट स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना
नवरात्रि में जवारे के दर्शन के लिए पहुंच रहे श्रद्धालु, नवमी पर किया जाएगा विसर्जन
सागर। नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की भक्ति और आराधना का विशेष अवसर है। इन दिनों मंदिरों में घट स्थापना और जवारे बोने की परंपरा निभाई जा रही है। सागर के बाघराज मंदिर में भी वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत गोविंद चौरसिया पंडा द्वारा चैत्र और शारदीय नवरात्रि में जवारे बोए जाते हैं और घट स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन बोए गए जवारों का नवमी तिथि पर विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है।
गोविंद चौरसिया ने बताया कि उनके परिवार में कई वर्षों से जवारे बोने और घट स्थापना की परंपरा चली आ रही है। पहले उनके पिता इस परंपरा का निर्वहन करते थे और अब वे स्वयं मां की आराधना करते हुए इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। नवरात्रि के दौरान सुबह से शाम तक जवारों की देखभाल और पूजा-अर्चना की जाती है। इस कार्य में मनोज चौरसिया भी सहयोग करते हैं और व्यवस्था से लेकर देखरेख तक की जिम्मेदारी निभाते हैं।
जवारे की हरियाली में सुख-समृद्धि की कामना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में जवारे बोना और घट स्थापना करना मां दुर्गा के प्रति आस्था, समर्पण और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जवारों की अच्छी वृद्धि और हरियाली को सुख-समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल की कामना से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह लोक आस्था और पारंपरिक विश्वास का विषय है।
घट स्थापना को भी नवरात्रि की पूजा का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। श्रद्धालु कलश में देवी शक्ति का आह्वान कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
आरती के बाद प्रसाद वितरण, नवमी पर होगा विसर्जन
बाघराज मंदिर में नवरात्रि के दौरान जवारे के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यहां आरती के बाद भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। श्रद्धालु जवारों के दर्शन कर मां दुर्गा से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।

गोविंद चौरसिया ने बताया कि नवरात्रि की नवमी तिथि पर विधि-विधान से जवारों का विसर्जन पास में बने कुएं में किया जाता है। इस तरह बाघराज मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के माध्यम से न केवल मां दुर्गा की आराधना की जा रही है, बल्कि धार्मिक आस्था और पारिवारिक विरासत को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।








