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तिलक भी एक प्रयोग है – आज्ञाचक्र को जगाने का वैज्ञानिक तरीका

तिलक भी एक प्रयोग है ...

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तिलक भी एक प्रयोग है – आज्ञाचक्र को जगाने का वैज्ञानिक तरीका
तिलक को आमतौर पर सिर्फ धार्मिक चिह्न या सजावट समझ लिया जाता है, पर यह एक गहरा वैज्ञानिक प्रयोग है। यह हमारे आज्ञाचक्र – तीसरी आंख – को सक्रिय करने का एक सीधा और सरल उपाय है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

*आज्ञाचक्र क्या है और क्यों है यह सबसे महत्वपूर्ण*

हमारे दोनों भौहों के बीच जो बिंदु है, उसे योग में आज्ञाचक्र कहते हैं। यह हमारे संकल्प का, हमारी इच्छाशक्ति का, हमारे अनुशासन का केंद्र है। हमारे जीवन में जो कुछ भी व्यवस्था है, जो भी आदेश है, जो भी संगति है – वह इसी चक्र से पैदा होती है। इसलिए इसे *•’आज्ञा’* चक्र कहा जाता है – यह आज्ञा देने का केंद्र है।

बिना जागे आज्ञाचक्र के हम गुलाम ही रहते हैं। 

यह बहुत हैरानी की बात है, पर जिस व्यक्ति का आज्ञाचक्र सक्रिय नहीं है, वह किसी न किसी रूप में गुलाम ही रहता है। एक गुलामी से छूटता है तो दूसरी में पड़ जाता है। उसके पास खुद को आज्ञा देने की सामर्थ्य ही नहीं होती। उसके शरीर और इंद्रियाँ ही उसे आज्ञा देती रहती हैं। पेट कहता है भूख लगी, तो वह खाता है। शरीर कहता है बीमार हूँ, तो वह बीमार हो जाता है। शरीर कहता है बूढ़ा हो गया, तो वह बूढ़ा हो जाता है। वह शरीर का गुलाम है, मन का गुलाम है, इंद्रियों का गुलाम है। राजनीतिक या आर्थिक स्वतंत्रता से यह गुलामी नहीं छूटती – यह गुलामी तो भीतर की है।

आज्ञाचक्र जागते ही पूरी व्यवस्था उलट जाती है। 

जैसे ही आज्ञाचक्र सक्रिय होता है, शरीर आज्ञा देना बंद कर देता है और आज्ञा लेना शुरू कर देता है। अब तुम मालिक बन जाते हो। तुम बहते हुए खून को कह दो – रुक जाओ – तो वह रुक जाता है। दिल की धड़कन को कह दो – ठहर जा – तो वह ठहर जाती है। नब्ज को कह दो – मत चल – तो वह नहीं चलती। तुम अपने शरीर, अपने मन, अपनी इंद्रियों के मालिक हो जाते हो। यह कोई चमत्कार नहीं – यह आज्ञाचक्र का जागने का सीधा परिणाम है।

तिलक – सिर्फ सजावट नहीं, एक सटीक प्रयोग

तिलक का संबंध आज्ञाचक्र से ही है। जब तुम तिलक लगाते हो, तो वह तुम्हारी त्वचा पर एक स्पर्श छोड़ जाता है। जब तुम पूरे दिन उस तिलक को लगाए रखते हो, तो बार-बार तुम्हारा ध्यान उसी बिंदु पर जाता है – चाहे तुम चाहो या न चाहो। तिलक लगाते ही वह स्थान पृथक हो जाता है – वह बाकी शरीर से अलग अनुभव होने लगता है। यह बहुत संवेदनशील स्थान है। शरीर का शायद सबसे संवेदनशील स्थान। उस संवेदनशीलता को स्पर्श करने की एक विधि है – और उसके लिए विशेष चीजों का ही उपयोग करना चाहिए।

चंदन का तिलक क्यों – इसका वैज्ञानिक कारण

हजारों प्रयोगों के बाद ऋषियों ने तय किया था – चंदन का ही तिलक क्यों लगाया जाए। कारण यह है कि चंदन में एक विशेष प्रकार की रेजोनेंस (अनुनाद) होती है, और उस स्थान की संवेदनशीलता में भी वैसी ही रेजोनेंस होती है। जब चंदन उस स्थान पर लगाया जाता है, तो यह रेजोनेंस मिलकर उस बिंदु की संवेदनशीलता को और गहन कर देती है। वह स्थान घना हो जाता है, अधिक सजग हो जाता है। यही कारण है कि सिर्फ चंदन का ही उपयोग किया जाता था, कोई और चीज़ नहीं।

बाजारू टीकों का खतरा

आज स्त्रियां जो बाजारू टीके लगाती हैं – लाल रंग के, चमकदार, रासायनिक – उनका योग से कोई लेना-देना नहीं है। उनके पीछे कोई वैज्ञानिकता नहीं है। ये टीके संवेदनशीलता को बढ़ाने के बजाय घटा देते हैं, मार देते हैं। प्रत्येक चीज के अलग परिणाम होते हैं। यहाँ छोटे से फर्क का बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसलिए ऋषियों ने कुछ विशेष चीजें ही खोजी थीं – उनमें से एक है चंदन। यदि आज्ञाचक्र को वास्तव में सक्रिय करना है तो सही चीज का ही प्रयोग करना चाहिए।

तिलक का प्रभाव – व्यक्तित्व में समग्रता और गरिमा

जब आज्ञाचक्र लगातार तिलक के कारण संवेदनशील होने लगता है और धीरे-धीरे सक्रिय होने लगता है, तो व्यक्तित्व में एक गरिमा और इंटीग्रिटी (अखंडता) आनी शुरू हो जाती है। एक समग्रता पैदा होती है। पहले व्यक्तित्व खंड-खंड में बँटा होता है – कभी कुछ, कभी कुछ। आज्ञाचक्र के जागने पर वह अखंड हो जाता है – कोई चीज उसे बिखेर नहीं पाती। वह एक जुट हो जाता है। उसके अंदर कोई एकत्रित ऊर्जा इकट्ठी हो जाती है, जो उसे साधारण से असाधारण बना देती है।

तिलक का अनुष्ठान – केवल गुरु द्वारा ही पहली बार

तिलक का प्रयोग एक अनुष्ठान है। पहली बार जब तिलक लगाया जाए, तो उसका एक पूरा विधान है। पहली दफा गुरु द्वारा ही तिलक दिलवाया जाता है, और वह भी पूरे अनुष्ठान के साथ। तभी वह परिणामकारी होता है। अन्यथा वह केवल एक औपचारिक घटना मात्र रह जाती है। उसका सही फल नहीं मिलता। आज सारी चीजें व्यर्थ हो गई हैं क्योंकि उनके पीछे का यह वैज्ञानिक रूप खत्म हो गया है। केवल तिलक की खोल रह गई है, जिसे हम बेमन से घसीट रहे हैं। उसके पीछे न मन का लगाव है, न आत्मा का भाव, न कोई वैज्ञानिक सूत्र।

प्रयोग – कैसे करें तिलक का सही उपयोग

यदि तुम्हारे पास असली चंदन है और उसे लगाने का सही तरीका पता है, तो प्रतिदिन सुबह ध्यान से पहले अपनी तर्जनी से थोड़ा सा चंदन लेकर पूरे भाव और संकल्प के साथ अपने भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) में तिलक लगाओ। लगाते समय यह भावना रखो कि मैं अपने आज्ञाचक्र को जगा रहा हूँ। मैं अपने शरीर, अपने मन, अपनी इंद्रियों का मालिक बन रहा हूँ।”* फिर उसी बिंदु पर ध्यान लगाकर कुछ देर बैठो। यदि यह नियमित हो जाए, तो धीरे-धीरे तुम पाओगे – तुम जो चाहो, वही होने लगता है। तुम्हारा संकल्प शक्तिशाली हो जाता है। तुम गुलाम नहीं, मालिक हो जाते हो।
कर्मकांड ज्योतिष विषेशज्ञ,डॉ अनिल दुबे वैदिक बिछुआ देवरी 9936443138

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मैं सूरज सेन पिछले 6 साल से पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं और मैने अलग अलग न्यूज चैनल,ओर न्यूज पोर्टल में काम किया है। खबरों को सही और सरल शब्दों में आपसे साझा करना मेरी विशेषता है।
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