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महंगी गैस ने बुझा दी उज्ज्वला की लौ! वनांचल की महिलाएं फिर लौटीं धुएं वाले चूल्हों पर

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महंगी गैस ने बुझा दी उज्ज्वला की लौ! वनांचल की महिलाएं फिर लौटीं धुएं वाले चूल्हों पर

 

तेंदूखेड़ा। तेंदूखेड़ा ब्लॉक के वनांचल क्षेत्र के सर्रा, भैंसा, बोरिया, कुदपुरा सहित दो दर्जन से अधिक गांवों में घरेलू गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और रोजगार के अभाव के कारण महिलाएं एक बार फिर पारंपरिक चूल्हों पर भोजन बनाने को मजबूर हैं। उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिलने के बावजूद महंगे सिलेंडर और आर्थिक तंगी के चलते अधिकांश परिवार नियमित रूप से गैस का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसके लिए महिलाओं को प्रतिदिन जंगलों से लकड़ी एकत्रित करनी पड़ रही है।

ग्रामीण महिलाओं सरोज बाई, आशा रानी, शीतला बाई, कमलरानी तथा रज्जू बाई ने बताया कि उनके घरों में गैस कनेक्शन तो उपलब्ध हैं, लेकिन सिलेंडर की बढ़ती कीमतें परिवार के बजट पर भारी पड़ रही हैं। कई बार गैस की उपलब्धता और समय पर आपूर्ति की समस्या भी सामने आती है। ऐसे में वे चूल्हे पर भोजन बनाना अधिक किफायती और सुविधाजनक मानती हैं। महिलाओं का कहना है कि ग्राम पंचायत स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं।

परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कई परिवारों को मजदूरी की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में पलायन तक करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में ईंधन पर होने वाला अतिरिक्त खर्च उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण एक गैस सिलेंडर जल्दी समाप्त हो जाता है, जिससे बार-बार सिलेंडर भरवाना आर्थिक रूप से संभव नहीं हो पाता। रज्जू बाई ने बताया कि रोजाना सुबह महिलाएं जंगलों में जाकर लकड़ी एकत्रित करती हैं। कई घंटे की मेहनत के बाद लकड़ी घर लाकर उसी से पूरे परिवार का भोजन तैयार किया जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया काफी श्रमसाध्य है, लेकिन आर्थिक मजबूरियों के कारण वे इसे अपनाने को विवश हैं। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि शहरों की तुलना में गांवों में लकड़ी अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो जाती है, इसलिए लोग जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग कर लेते हैं। लेकिन धुएं से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं और बढ़ती मेहनत को देखते हुए वे स्वच्छ ईंधन का उपयोग करना चाहती हैं। महिलाओं ने सरकार से घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में राहत देने, नियमित गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि गैस सस्ती और सुलभ हो जाए तो वे चूल्हे के धुएं से मुक्ति पाकर स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर सकेंगी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में चूल्हा ही उनके लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प बना हुआ है

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