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MP : सदियों बाद मिलेंगे नर्मदा और सोनभद्र! विंध्य के सीने में बनी 12 किमी लंबी सुरंग

MP : सदियों बाद मिलेंगे ...

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MP : सदियों बाद मिलेंगे नर्मदा और सोनभद्र! विंध्य के सीने में बनी 12 किमी लंबी सुरंग

भोपाल। नर्मदा नदी का पानी सोन बेसिन तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षी परियोजना अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद क्षेत्र में विंध्य पर्वतमाला के भीतर बनाई जा रही करीब 12 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NBDA) के अनुसार, 14 जुलाई तक सुरंग में कार्यरत टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) निर्धारित सीमेंटेड कुएं तक पहुंच गई, जिससे नर्मदा के जल के लिए आगे का मार्ग पूरी तरह तैयार हो गया है।
अब परियोजना में केवल सुरंग के भीतर लगी मशीनों को बाहर निकालने की प्रक्रिया बाकी है। एनबीडीए के एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया कि लगभग डेढ़ महीने के भीतर मशीनों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाएगा। इसके बाद नहर में पानी छोड़ने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
लोककथा में बिछड़े नर्मदा और सोनभद्र, अब परियोजना से जुड़ेंगे दोनों
मैकल पर्वत श्रृंखला से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा में नर्मदा और सोनभद्र का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि मैकल पर्वत की पुत्री नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय हुआ था। विवाह से पहले नर्मदा ने अपनी सखी जुहिला को सोनभद्र से मिलने भेजा, ताकि वह लौटकर उनके बारे में बताए। लेकिन सोनभद्र ने जुहिला को ही नर्मदा समझ लिया। जब नर्मदा को इसका पता चला तो वे आहत होकर पश्चिम दिशा की ओर मुड़ गईं, जबकि सोनभद्र पूर्व की ओर बह निकला। इस तरह दोनों नदियां एक ही पर्वत से निकलने के बावजूद कभी नहीं मिल सकीं।
आज उसी विंध्य पर्वत के बीच बनाई गई सुरंग ने सदियों पुरानी इस प्रतीकात्मक दूरी को कम करने का रास्ता तैयार किया है। एक ओर पश्चिम की ओर बहने वाली नर्मदा और दूसरी ओर पूर्व की दिशा में बहने वाले सोनभद्र के बीच अब मानव निर्मित यह सुरंग जल प्रवाह का माध्यम बनेगी।
2011 में शुरू हुआ था सुरंग निर्माण
नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना के तहत इस सुरंग का निर्माण वर्ष 2011 में शुरू किया गया था। सलैया फाटक से खिरहनी गांव तक पहाड़ों के भीतर बनाई गई सुरंग के डाउनस्ट्रीम हिस्से का काम पहले ही पूरा हो चुका था। अपस्ट्रीम भाग का कार्य वर्ष 2025 के अंत तक पूरा होना प्रस्तावित था, लेकिन समय-सीमा बढ़ने के बाद अब यह निर्माण भी पूरा हो गया है।
एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया कि स्लीमनाबाद के पास बनाई जा रही इस टनल का निर्माण लगभग समाप्त हो चुका है। सोमवार तक केवल छह मीटर खुदाई शेष थी, जिसे मंगलवार तक पूरा कर लिया गया। अब मशीनों को तैयार किए गए कुएं तक लाकर उन्हें अलग-अलग हिस्सों में खोलकर बाहर निकाला जाएगा। इसके साथ ही वर्षों से चल रही नर्मदा जल पहुंचाने की इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण चरण भी पूरा हो जाएगा।
विदेशी मशीनों से बनी सुरंग, 100 फीट गहरे कुएं से निकाली जाएंगी बाहर
सुरंग निर्माण में अमेरिका और जर्मनी से मंगाई गई अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीनों का उपयोग किया गया। इन्हें बाहर निकालने के लिए एनबीडीए ने करीब 100 फीट गहरा सीमेंटेड कुआं तैयार कराया है। मशीनों को अलग-अलग हिस्सों में खोलकर क्रेन की मदद से बाहर निकाला जाएगा। इसके अलावा सुरंग के भीतर बिछाई गई रेलवे ट्रैक और अन्य निर्माण सामग्री भी हटाई जाएगी।
799 करोड़ से बढ़कर 1500 करोड़ पहुंची परियोजना लागत
जब इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी, तब इसकी अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपये तय की गई थी। हालांकि निर्माण अवधि बढ़ने और तकनीकी कार्यों के विस्तार के कारण परियोजना की लागत बढ़कर लगभग 1500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
करीब 11.952 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली यह सुरंग भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग मानी जा रही है। इसकी खासियत यह है कि एक बार पानी छोड़े जाने के बाद नर्मदा का जल बिना पंपों की सहायता के प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण के आधार पर आगे बढ़ेगा।
इंजीनियरों और मजदूरों के सामने थीं कई बड़ी चुनौतियां
इस परियोजना का निर्माण तकनीकी दृष्टि से बेहद जटिल रहा। विंध्य पर्वतमाला की कठोर चट्टानों के बीच सुरंग बनाना आसान नहीं था। इंजीनियरों और श्रमिकों को सिंकहोल, भूजल रिसाव, वायु हानि, द्रवीकरण जैसी चुनौतियों के साथ-साथ भारी चट्टानों के मलबे, अत्यधिक कठोर पत्थरों, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और टनल बोरिंग मशीनों के कटर हेड्स के बार-बार क्षतिग्रस्त होने जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा।
सुरंग के भीतर लगातार भूजल आने से पंपों को निरंतर चलाना पड़ा।  इंजीनियरों ने हर नई चट्टान की संरचना का अध्ययन किया, जबकि श्रमिकों ने पानी निकालने, मलबा साफ करने और मशीनों के आगे बढ़ने के लिए लगातार रास्ता तैयार किया।
सुरंग के भीतर दिन और रात का कोई अंतर महसूस नहीं होता था। वहां समय का आकलन केवल घड़ियों के सहारे किया जाता था। हवा की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी गई और सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए काम आगे बढ़ाया गया। कई किलोमीटर भीतर काम करने वाले श्रमिकों को अपनी शिफ्ट पूरी होने के बाद ही खुले आसमान की झलक मिल पाती थी।
लंबे समय तक चली कठिन मेहनत, आधुनिक तकनीक और इंजीनियरों से लेकर श्रमिकों तक के समर्पित प्रयासों के बाद यह सुरंग तैयार हुई है। विंध्य पर्वत को चीरकर नर्मदा के जल को सोन बेसिन तक पहुंचाने का यह कार्य देश की महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग उपलब्धियों में शामिल माना जा रहा है।

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मैं सूरज सेन पिछले 6 साल से पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं और मैने अलग अलग न्यूज चैनल,ओर न्यूज पोर्टल में काम किया है। खबरों को सही और सरल शब्दों में आपसे साझा करना मेरी विशेषता है।
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