भीतर के अंधकार से लड़ने का नाम है भक्ति! पढ़िए आत्मा को छू लेने वाला आलेख
मनुष्य का जीवन केवल दिनों और वर्षों की गणना नहीं है; वह भीतर और बाहर के अनगिनत संघर्षों से गुजरती हुई एक ऐसी यात्रा है, जिसमें प्रत्येक मोड़ आत्मा से कोई नया प्रश्न पूछता है। कभी समय वसंत की तरह मन में हरियाली भर देता है, तो कभी अचानक सब कुछ सूना हो जाता है — जैसे भीतर का आकाश बिना किसी चेतावनी के धुँधला पड़ गया हो।
ऐसे क्षणों में मनुष्य को सबसे अधिक भय बाहरी अंधकार से नहीं, बल्कि अपने भीतर फैलती हुई उस निस्तब्ध रिक्तता से होता है, जहाँ सभी उत्तर धीरे-धीरे मौन हो जाते हैं। और शायद वहीं से भक्ति का वास्तविक आरंभ होता है।
भक्ति मंदिरों की घंटियों में उतनी नहीं रहती, जितनी उस अकेले मनुष्य की निस्सहाय आँखों में रहती है, जो टूट जाने के बाद भी भीतर किसी अदृश्य प्रकाश पर विश्वास बनाए रखता है। दीपक की लौ तब तक केवल लौ है, जब तक वह उत्सवों में जलती है; किंतु जब वही लौ आँधियों के बीच काँपते हुए भी बुझती नहीं, तभी वह श्रद्धा बन जाती है।
जीवन में ऐसे समय आते हैं, जब मनुष्य अपने ही बनाए हुए सहारों को धीरे-धीरे बिखरते हुए देखता है। संबंधों की छाया छोटी पड़ने लगती है, शब्द सांत्वना देना छोड़ देते हैं, और बुद्धि भी अनेक प्रश्नों के सामने असहाय खड़ी रह जाती है। तब भीतर कहीं बहुत गहराई में एक सूक्ष्म पुकार जन्म लेती है — ऐसी पुकार, जिसे होंठ नहीं, आत्मा करती है।
शायद इसी क्षण को गोस्वामी तुलसीदास ने अनुभव किया होगा, जब उन्होंने लिखा—
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”
यह केवल भाग्य का स्वीकार नहीं है; यह उस अहंकार का विसर्जन है, जो जीवन को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। आधुनिक मनुष्य ने विज्ञान और बुद्धि के सहारे बहुत कुछ पा लिया है, किंतु भीतर की शांति आज भी उसकी सबसे बड़ी अनुपस्थित वस्तु बनी हुई है। वह आकाश को माप सकता है, किंतु अपने भीतर के भय की गहराई नहीं माप पाता।
आज का समय विचित्र है।
चारों ओर प्रकाश बढ़ा है, किंतु मनुष्य के भीतर अंधकार गहराता जा रहा है।
संवाद बढ़े हैं, पर आत्माएँ अधिक अकेली हो गई हैं।
सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर हृदय का संतुलन कमज़ोर हो गया है।
मनुष्य भीड़ में रहते हुए भी अपने भीतर एक निर्जन वन का अनुभव करता है। और उस वन में जब सब दिशाएँ धुँधली पड़ने लगती हैं, तब ईश्वर का स्मरण किसी उत्तर की तरह नहीं, बल्कि एक शांत स्पर्श की तरह उतरता है।
महाभारत में द्रौपदी का प्रसंग केवल चमत्कार की कथा नहीं है। वह उस अंतिम क्षण का प्रतीक है, जब मनुष्य अपने सारे प्रयासों के टूट जाने के बाद पहली बार पूर्ण समर्पण करना सीखता है। जब तक मनुष्य अपने अहंकार की उँगली पकड़े रहता है, तब तक वह ईश्वर को केवल विचार की तरह जानता है; किंतु जब वह भीतर से असहाय हो जाता है, तब ईश्वर अनुभव बनकर उतरते हैं।
संत कबीर ने शायद इसी गहरे सत्य को सहज शब्दों में कहा था—
“दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय॥”
स्मरण केवल संकट का सहारा नहीं होना चाहिए।
भक्ति यदि केवल दुःख के दिनों में जागे, तो वह अभी पूर्ण नहीं हुई।
सच्ची भक्ति वह है, जो सुख में भी विनम्र बनी रहे और उपलब्धियों के बीच भी भीतर का दीप शांत रख सके।
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह स्वयं को अपने जीवन का केंद्र मान बैठता है। किंतु विपत्तियाँ धीरे-धीरे उसके भीतर की कठोर परतों को तोड़ती हैं। दुःख मनुष्य को केवल रुलाता नहीं; वह उसे उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित भी कराता है। सुख प्रायः मनुष्य को बाहर की ओर ले जाता है, जबकि पीड़ा उसे अपने भीतर उतरने के लिए विवश करती है।
शायद इसी कारण अनेक संतों के जीवन में कष्ट अभिशाप नहीं, जागरण बने।
प्रह्लाद अग्नि के बीच भी इसलिए शांत थे, क्योंकि उनका विश्वास परिस्थितियों पर आधारित नहीं था। श्रद्धा तब तक अधूरी है, जब तक वह अनुकूलताओं की छाया में पलती है। उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब चारों ओर भय हो और भीतर फिर भी कोई मौन स्वर कहे —
“सत्य अभी जीवित है।”
भारतीय अध्यात्म में रामकृष्ण परमहंस का जीवन इसी निष्कलुष प्रेम का उदाहरण है। उनके लिए ईश्वर तर्क का विषय नहीं थे; वे अनुभूति की साँसों में बसे हुए थे। आधुनिक मनुष्य हर सत्य को प्रमाणों में बाँधना चाहता है, किंतु कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल जिया जा सकता है। जैसे कोई सुगंध दिखाई नहीं देती, फिर भी पूरे वातावरण को भर देती है। वैसे ही ईश्वर का स्पर्श भी शब्दों से अधिक मौन में अनुभव होता है।
रामचरितमानस की यह चौपाई भक्ति के समस्त रहस्य को अत्यंत सहजता से खोल देती है।
“रामहि केवल प्रेम पियारा।
जानि लेउ जो जाननिहारा॥”
ईश्वर को मनुष्य की उपलब्धियों से अधिक उसके हृदय की निर्मलता प्रिय है। इतिहास में अनेक महान भक्त साधारण जीवन से आए, किंतु उनकी आत्मा प्रेम से दीप्त थी। भक्ति का संबंध वैभव से नहीं, भीतर की पवित्रता से है।
आज मनुष्य ने अपने चारों ओर असंख्य साधन निर्मित कर लिए हैं, किंतु वह अपने भीतर के मौन से दूर होता जा रहा है। चिंता, असुरक्षा और अवसाद केवल मानसिक अवस्थाएँ नहीं हैं; वे उस थकान के संकेत हैं, जहाँ आत्मा स्वयं से कटने लगती है। ऐसे समय में आध्यात्मिकता संसार से पलायन नहीं, बल्कि अपने भीतर लौटने का मार्ग बन सकती है।
भगवान श्रीकृष्ण का यह वचन इसलिए आज भी उतना ही जीवंत है।
“योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
यह केवल धार्मिक आश्वासन नहीं, बल्कि भयभीत मनुष्य के भीतर रखी गई एक शांत हथेली है। जब मनुष्य अपने सीमित अस्तित्व से ऊपर उठकर व्यापक चेतना से जुड़ता है, तब उसके भीतर धीरे-धीरे भय का स्थान विश्वास लेने लगता है।
और शायद विश्वास का अर्थ यही है —
अंधकार के पूर्णतः समाप्त हो जाने की प्रतीक्षा करना नहीं,
बल्कि अंधकार के बीच भी भीतर एक दीप जलाए रखना।
सच्ची भक्ति जीवन से दुःखों को समाप्त नहीं करती; वह मनुष्य को इतना गहरा बना देती है कि दुःख उसे पूरी तरह तोड़ नहीं पाते। जो व्यक्ति विपत्ति में भी करुणा बचाए रख सके, संघर्ष में भी सत्य का हाथ न छोड़े, और अकेलेपन में भी भीतर किसी दिव्य उपस्थिति का अनुभव करता रहे — वही वास्तविक साधक है।
क्योंकि अंततः ईश्वर मंदिरों की दीवारों से अधिक मनुष्य के धैर्य में निवास करते हैं।
वे आरतियों की ध्वनि से अधिक उस मौन में सुनाई देते हैं, जहाँ आत्मा स्वयं को समर्पित कर देती है।
और शायद भक्ति का अंतिम सत्य भी यही है—
जब जीवन की सारी दिशाएँ धुँधली पड़ जाएँ,
जब शब्द थक जाएँ,
जब मनुष्य अपने भीतर पूरी तरह अकेला रह जाए —
तब भी यदि उसके अंतःकरण में श्रद्धा का एक सूक्ष्म दीप जलता रहे,
तो समझना चाहिए कि अंधकार अभी अंतिम नहीं हुआ है।
आलेख: पंडित आरंभ शुक्ला








