स्वस्थ बाघिन अब लौटेंगी अपने घर टाइगर रिजर्व लेकिन गुस्सा अब भी ज्यादा
आशंका खत्म – डेढ़ माह बाद बाघिन की जांच रिपोर्ट निगेटिव वन विभाग ने ली राहत की सांस 8 जुलाई को रेस्क्यू कर भेजा था जबलपुर
रिपोर्ट – विशाल रजक
तेन्दूखेड़ा। वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से करीब डेढ़ माह पहले 8 जुलाई को रेस्क्यू कर जबलपुर भेजी गई बाघिन की जल्द घर वापसी होगी वेटरनरी कॉलेज जबलपुर के चिकित्सकों की देखरेख में उपचार करा रही बाघिन की सेहत को लेकर बना संकट अब टल गया है। दोबारा कराई गई जांच में केनाइन डिस्टेम्पर की रिपोर्ट निगेटिव आई है इससे वन विभाग ने राहत की सांस ली है। अब बाघिन के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उसे उसके प्राकृतिक रहवास यानी जंगल में वापस छोड़ने की तैयारी शुरू कर दी गई है। विश्वविद्यालय प्रबंधन वन विभाग से बाघिन को वापस ले जाने के संबंध में चर्चा कर रहा है
*घायल अवस्था जबलपुर भेजा गया था*
वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र से बाघिन को गंभीर हालत में रेस्क्यू कर 9 जुलाई को जबलपुर स्थित एसडब्ल्यूएफएचएस भेजा गया था करीब डेढ़ साल की बाघिन अपनी मां से बिछड़कर जंगल में अकेली भटक गई थी लंबे समय तक भोजन और पानी नहीं मिलने के कारण उसकी हालत बेहद कमजोर हो गई थी। वह स्वयं भोजन करने में भी असमर्थ थी गंभीर स्थिति को देखते हुए वन विभाग ने उसे तत्काल उपचार के लिए वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर पहुंचाया था रेस्क्यू के बाद से वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर जबलपुर ही बाघिन का अस्थायी ठिकाना बना हुआ था जहां चिकित्सकों और कर्मचारियों की टीम लगातार उसकी निगरानी कर रहे थे भोजन, दवाओं और स्वास्थ्य की नियमित जांच के साथ उसके व्यवहार पर भी नजर रखी गई अब केनाइन डिस्टेम्पर की आशंका खत्म होने के बाद बाघिन को वापस जंगल में छोड़ने को लेकर वन विभाग और विश्वविद्यालय प्रबंधन के बीच चर्चा चल रही है अगले कुछ दिनों में बाघिन को उसके प्राकृतिक रहवास वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में छोड़ा जा सकता है लेकिन बताया जा रहा है बाघिन का गुस्सा अभी भी पूरी तरह से कम नहीं हुआ है।
दोबारा तबीयत बिगड़ी तो बढ़ी चिंता
जबलपुर में चिकित्सकों की निगरानी में बाघिन का लगातार उपचार किया जा रहा था। उपचार के बाद उसकी सेहत में तेजी से सुधार हुआ, लेकिन बीच में दोबारा तबीयत खराब होने पर चिकित्सकों ने उसकी जांच कराई। इस दौरान केनाइन डिस्टेम्पर संक्रमण की आशंका ने चिंता बढ़ा दी थी वन्यजीवों में यह गंभीर बीमारी मानी जाती है। संक्रमण की स्थिति में बाघिन को जंगल में छोड़ना दूसरे वन्यजीवों के लिए भी जोखिम भरा हो सकता था। इसी वजह से वन विभाग भी उसे वापस जंगल में छोड़ने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था








