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एक तरफ पर्यावरण संरक्षण की दुहाई, दूसरी तरफ मालथौन के जंगलों से खैर का सफाया, तस्करों के आगे मौन

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एक तरफ पर्यावरण संरक्षण की दुहाई, दूसरी तरफ मालथौन के जंगलों से खैर का सफाया, तस्करों के आगे मौन
सागर/मालथौन। देश और प्रदेश में एक ओर जहां सरकारी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी दुहाई दी जा रही हैं, वही दूसरी ओर जमीनी हकीकत इसके उलट बेहद गंभीर है। मालथौन वन परिक्षेत्र के हरे-भरे जंगल लगातार वीरान होते जा रहे हैं। क्षेत्र के जंगलों से बेश कीमती खैर सहित अन्य कीमती पेड़ तेजी से गायब हो रहे हैं और जंगल के रख वाले चैन की नींद सो रहे हैं। वन परिक्षेत्र के चनारी और इटवा सहित कई इलाकों में अब खैर के वृक्षों की जगह सिर्फ कटे हुये ठूंठ दिखाई दे रहे हैं, जो यहां हुये जंगल की बर्बादी की गवाही दे रहे हैं। विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मालथौन क्षेत्र में एक समय खैर के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाये जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे वन माफियाओं की नजर इस बेशकीमती लकड़ी पर पड़ गई। आरोप है कि स्थानीय वन रक्षकों और तस्करों के बीच गहरी साठगांठ है, जिसके दम पर इस पूरे खेल को अंजाम दिया जा रहा है। पिछले महज एक साल के भीतर इटवा और चनारी के जंगलों से सैकड़ों खैर के पेड़ों की कटाई धड़ल्ले से की गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस महा विनाश के बाद भी वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी लक्ष्मी जाप में मग्न हैं और उन्होंने इस ओर से पूरी तरह आंखें मूंद रखी हैं।
उत्तर प्रदेश की सीमा का फायदा उठा रहे तस्कर, रात के अंधेरे में पार हो रही लकड़ी
मालथौन वन परिक्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ है। भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर अंतरराज्यीय लकड़ी तस्कर क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। सूत्रों का कहना है कि विभागीय सांठगांठ के चलते तस्कर बे-खौफ होकर कुल्हाड़ियों और आधुनिक कटर मशीनों से रात के अंधेरे में पेड़ों की कटाई करते हैं। इसके बाद इन लकड़ियों को वाहनों में भरकर आसानी से उत्तर प्रदेश की सीमा पार करा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जंगल की सुरक्षा में तैनात मैदानी अमले की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध बनी हुई है। हाइवे से लगी वन भूमि से जंगल साफ हो रहे है कई जगह समतल नजर आ रहा हैं।
नाम किसी का, काम अपना के फॉर्मूले पर चल रहा खेल
मामले में एक और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक वन विभाग के कुछ रक्षक ही अब खुद पर्दे के पीछे रहकर ठेकेदार की भूमिका निभा रहे हैं। इनका काम करने का तरीका नाम किसी का और काम अपना के फॉर्मूले पर आधारित है। इस अवैध कारोबार और वनों की कटाई के जरिए ये कथित रक्षक लाखों रुपये की काली कमाई कर रहे हैं। यही वजह है कि वरिष्ठ अधिकारियों तक इस बर्बादी की भनक नहीं पहुंचने दी जा रही है।

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हमारे बारे में योगेश दत्त तिवारी पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और मीडिया की दुनिया में एक विश्वसनीय और सशक्त आवाज के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। अपने समर्पण, निष्पक्षता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने पत्रकारिता में एक मजबूत स्थान बनाया है। पिछले 15 वर्षों से वे प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'देशबंधु' में संपादक के रूप में कार्यरत हैं। इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने समाज के ज्वलंत मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है और पत्रकारिता के उच्चतम मानकों को बनाए रखा है। उनकी लेखनी न सिर्फ तथ्यपरक होती है, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जागृत करती है। योगेश दत्त तिवारी का उद्देश्य सच्ची, निष्पक्ष और जनहितकारी पत्रकारिता को बढ़ावा देना है। उन्होंने हमेशा युवाओं को जिम्मेदार पत्रकारिता के लिए प्रेरित किया है और पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम माना है। उनकी संपादकीय दृष्टि, विश्लेषणात्मक क्षमता और निर्भीक पत्रकारिता समाज के लिए प्रेरणास्रोत रही है।
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