भगवान शिव को किस धातु के लोटे से चढ़ाना चाहिए जल, जानें जलाभिषेक से जुड़े खास नियम
जलाभिषेक नियम: सनातन धर्म में महादेव को आशुतोष कहा गया है, जिसका अर्थ है- जो भक्तों पर जल्द प्रसन्न हो जाएं. पौराणिक मान्यता है कि शिवजी को प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े तामझाम की जरूरत नहीं है, सिर्फ एक लोटा जल ही उनकी कृपा पाने के लिए काफी है.
नियमित जलाभिषेक करने से न सिर्फ मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन के बड़े से बड़े संकट भी आसानी से दूर हो जाते हैं. हालांकि, महादेव की पूजा जितना आसान है, इसके नियम उतने ही महत्वपूर्ण हैं. अगर शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय सही विधि या पात्र (लोटे) का चुनाव न किया जाए, तो पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता. ऐसे में आइए जानते हैं कि शिवलिंग पर किस धातु के लोटे से जल अर्पित करना चाहिए, तांबा, पीतल या स्टील और जलाभिषेक से जुड़े खास नियम क्या हैं.
तांबे का लोटा
शास्त्रों के अनुसार, तांबा सबसे शुद्ध धातु मानी गई है. शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए तांबे का पात्र सबसे उत्तम होता है. इसके पीछे वैज्ञानिक कारण ये है कि तांबे में जल रखने से वह शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है. तांबे के लोटे से जल चढ़ाना तो शुभ है, लेकिन भूलकर भी तांबे के पात्र से शिवलिंग पर दूध न चढ़ाएं. तांबे के संपर्क में आते ही दूध विष के समान हो जाता है, जो पूजा के फल को नकारात्मक बना सकता है. दूध के लिए पीतल या चांदी का प्रयोग करें.
पीतल का लोटा
तांबे के बाद पीतल को पूजा-पाठ के लिए श्रेष्ठ धातु माना गया है. अगर आपके पास तांबे का पात्र नहीं है, तो आप पीतल के लोटे का उपयोग कर सकते हैं. पीतल के लोटे से जल और दूध दोनों अर्पित किए जा सकते हैं.
चांदी का पात्र
चंद्रदेव का संबंध चांदी से है और शिव जी ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है. इसलिए चांदी के लोटे से जलाभिषेक करना अत्यंत शुभ और मन को शांति देने वाला माना जाता है.
स्टील या लोहे का पात्र
शिव पूजा में स्टील, लोहा या प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग वर्जित माना गया है. स्टील एक मिश्रित धातु है और लोहे का संबंध शनि देव से है, जिसे शिव पूजा (जलाभिषेक) के लिए शास्त्रों में शुभ नहीं माना गया है. भक्ति के भाव में यदि कुछ न हो तो मिट्टी का पात्र श्रेष्ठ है, लेकिन स्टील से बचना चाहिए.
शिवलिंग पर जलाभिषेक के नियम
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय सिर्फ धातु ही नहीं, बल्कि विधि का पालन करना भी जरूरी है. कभी भी खड़े होकर जलाभिषेक न करें. हमेशा बैठकर या झुककर जल अर्पित करना चाहिए. जल चढ़ाते वक्त पात्र को शिवलिंग से बहुत ऊंचा न रखें और जल की एक पतली व अटूट धारा बनाकर चढ़ाएं. जल चढ़ाते समय आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए (ताकि जल उत्तर दिशा की ओर गिरे). कभी भी पूर्व की ओर मुख करके जल न चढ़ाएं, क्योंकि वह देवों का मार्ग माना जाता है. जल चढ़ाते समय सबसे पहले गणेश जी, फिर कार्तिकेय, माता पार्वती (अशोक सुंदरी) और अंत में शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए. शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय कभी भी हथेली से शिवलिंग को न रगड़ें, जब तक कि आप पूर्ण पूजन (अभिषेक) न कर रहे हों.
कर्मकांड ज्योतिष विषेशज्ञ डॉ अनिल दुबे वैदिक देवरी बिछुआ 9936443138








