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100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार, भाइयों के साथ जिंदगीभर का साथ; जानिए चीतों की अनोखी दुनिया

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100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार, भाइयों के साथ जिंदगीभर का साथ; जानिए चीतों की अनोखी दुनिया

रिपोर्ट – विशाल रजक

तेंदूखेड़ा। वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व चीतों का तीसरा घर बनने जा रहा है. इसके लिए टाइगर रिजर्व के अंदर करीब 600 वर्ग किलोमीटर की जगह चिन्हित की गई है. और तैयारी भी जोर-जोर से चल रही है. इसके अलावा जो वनरक्षक है. उनको भी इसको लेकर कूनो में प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है. जंगल के अंदर जो गांव अभी विस्थापन के लिए बच्चे हैं हजारों लोग रह रहे हैं. उनके लिए भी चीता चौपाल लगाई जा रही है इनको लेकर जो भ्रांतियां हैं लोगों के मन में नेगेटिव बातें बैठी हुई है उनको दूर किया जा रहा है इनके संरक्षण का उद्देश्य और महत्व बताया जा रहा है
आज हम बड़ी बिल्ली प्रजाति के सबसे छोटे वन्य जीव कहलाने वाले चीता के बारे में बात करेंगे. इनकी क्या खासियत होती है. यह तेंदुआ और टाइगर से कितने अलग होते हैं इनका व्यवहार किस तरह का होता है. किस तरह से यह रहना शिकार करना पसंद करते हैं. नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश सिंह बताते हैं कि चीता घास के मैदान और खुले क्षेत्र में रहना पसंद करते हैं. यह अपनी अद्भुत रफ्तार और रफ्तार के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं. इनके जो शिकार करने का जो तरीका है
*रफ्तार बनी सबसे बड़ी ताकत*
इनका जो शिकार ब्लैक बग चीतल चिंकारा नीलगाय के छोटे बच्चे यानी कि कम वजन वाले जो वन्य जीव होते हैं. उनको पहले चेस करते हैं चेस करने के दौरान ही उनका शिकार करते हैं और उनकी कोशिश होती है. वह एक बार के हमले में ही मर जाए, जिससे ना तो छुपाने का डर हो और ना ही रखने का है. यह बहुत ही कम समय में 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी दौड़ सकते हैं. इन्हें धरती पर रहने वाले सबसे तेज दौड़ने वाले वन्यजीवों में गिना जाता है. चीतो की एक और प्रवृत्ति होती है कि वह टाइगर और तेंदुआ की तरह अकेले नहीं होते हैं. ग्रुप में रहना पसंद करते हैं. उनके ग्रुप में जो दो-तीन भाई-बहन होते हैं. वह जिंदगी भर साथ रहते हैं साथ घूमते हैं और शिकार करते हैं. इसलिए इनको सामाजिक होना भी कहा जाता है
*चीता का जीवन चक्र 10 – 12 साल का होता*
इनके नाखून भी छोटे होते यानी कि टाइगर कि तरह इनके नाखून अंदर बाहर नहीं होते हैं.
जिनकी वजह से उनकी पकड़ कमजोर होती है. किसी के चलते वह पेड़ों पर नहीं जा पाए और यह छोटे जीवों का शिकार करते हैं. चीता का जीवन चक्र 10 – 12 साल का होता है. इनके शरीर पर ब्लैक स्पॉट होते हैं. जबकि चेहरे पर नाक के नीचे से धारियां होती हैं. हर चीता पर ब्लैक स्पॉट और धारियां अलग-अलग होती हैं जो इनकी पहचान का कारण बनती है. मैं टाइगर और तेंदुआ की तरह दहाड़ने वाला आर्गन गले में नहीं होता है यह बिल्ली की तरह आवाज निकालता है
*बाड़ों का 50% काम पूरा*
टाइगर रिजर्व में बाड़ों का काम 50 फीसदी हो चुका है जुलाई के अंत तक बाड़े तैयार होने की उम्मीद है अगस्त अंत तक रिजर्व में चीता शिफ्ट होने का अनुमान है भारत सरकार की एक मॉनिटरिंग कमेटी है जिसे चीता शिफ्टिंग को लेकर अंतिम निर्णय होना है मुहली रेंज में आधुनिक बोमा बाड़े तैयार किए जा रहे हैं इन बांडों का क्षेत्रफल लगभग 439 एकड़ होगा सुरक्षा की दृष्टि से 14 फीट ऊंचे सॉफ्ट रिलीज बाड़े और 10 फीट ऊंचे क्वारेंटीन बोमा बनाए जा रहे हैं बाड़ों के ऊपरी हिस्से में 6 लेयर के इलेक्ट्रिक पल्स तार लगाए जाएंगे जो शिकारी जानवरों को दूर रखेंगे बाड़ों का 50 फीसदी काम पूरा हो चुका है

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हमारे बारे में योगेश दत्त तिवारी पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और मीडिया की दुनिया में एक विश्वसनीय और सशक्त आवाज के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। अपने समर्पण, निष्पक्षता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने पत्रकारिता में एक मजबूत स्थान बनाया है। पिछले 15 वर्षों से वे प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'देशबंधु' में संपादक के रूप में कार्यरत हैं। इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने समाज के ज्वलंत मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है और पत्रकारिता के उच्चतम मानकों को बनाए रखा है। उनकी लेखनी न सिर्फ तथ्यपरक होती है, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जागृत करती है। योगेश दत्त तिवारी का उद्देश्य सच्ची, निष्पक्ष और जनहितकारी पत्रकारिता को बढ़ावा देना है। उन्होंने हमेशा युवाओं को जिम्मेदार पत्रकारिता के लिए प्रेरित किया है और पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम माना है। उनकी संपादकीय दृष्टि, विश्लेषणात्मक क्षमता और निर्भीक पत्रकारिता समाज के लिए प्रेरणास्रोत रही है।
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