बेखौफ मत घूमना… दानव अभी जिंदा है, सवाल बेटियों की आजादी का नहीं हमारी सोच का है….
समाज कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वहां महिलाएं और बेटियां कितनी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करती हैं। समाज मे जंहा एक तरफ बेटियों को कहा जाता हैं- आगे बढ़ो, अपने सपने पूरे करो, आसमान छुओ। वहीं दूसरी ओर उसी बेटी के घर से बाहर निकलते ही एक दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है- क्या वह सुरक्षित लौटेगी?
यह सवाल भावनाओं से नहीं, आंकड़ों से पूछना होगा।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज हुए। 2022 में यह संख्या 4,45,256 थी। 2023 में बलात्कार के 29,670, महिलाओं के अपहरण या व्यपहरण के 88,605, महिलाओं पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग के 83,891 और पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1,33,676 मामले दर्ज हुए।
इन आंकड़ों को केवल संख्याएं समझकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी भूल होगी। क्योंकि हर संख्या के पीछे एक चेहरा है, एक परिवार है, एक भय है और कई बार पूरी जिंदगी पर पड़ने वाला असर है।
लेकिन यहां एक जरूरी तथ्य भी समझना होगा। एनसीआरबी के आंकड़े दर्ज मामलों के हैं। अपराधों की वास्तविक संख्या और दर्ज मामलों की संख्या हमेशा समान नहीं होती। जागरूकता बढ़ने, हेल्पलाइन और शिकायत व्यवस्था तक पहुंच बढ़ने से भी रिपोर्टिंग बढ़ सकती है। इसलिए आंकड़ों में वृद्धि को हर स्थिति में अपराध की वास्तविक वृद्धि मानना उचित नहीं है।
फिर भी 4.48 लाख दर्ज मामले हमें यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि आखिर वह सामाजिक मानसिकता कब बदलेगी, जिसमें महिला की स्वतंत्रता पर सवाल पहले उठता है और अपराधी की मानसिकता पर बाद में?
हमारी सबसे बड़ी विडंबना यही है कि लड़की से कहा जाता है – रात में अकेली मत निकलना, मोबाइल संभालकर रखना, अनजान लोगों से बात मत करना, कपड़ों का ध्यान रखना।
लेकिन लड़के से कितनी बार कहा जाता है कि किसी लड़की की ना का सम्मान करना। उसकी इच्छा के बिना उसे छूना अपराध है। दोस्ती, प्रेम या संबंध खत्म होने के बाद भी सामने वाले की स्वतंत्रता का सम्मान करना जरूरी है।
बेटियों की सुरक्षा के नाम पर उनकी आजादी सीमित करना आसान है। मुश्किल काम है अपराधी मानसिकता को बदलना।
कानून भी तभी प्रभावी है जब शिकायत पर कार्रवाई हो, जांच निष्पक्ष हो, पीड़िता को सुरक्षा मिले और न्याय समय पर मिले।
किसी बेटी के साथ अपराध होने के बाद मोमबत्ती जलाना आसान है। अपराध होने से पहले सुरक्षित माहौल बनाना कठिन है।
सड़क की पर्याप्त रोशनी, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, संवेदनशील पुलिसिंग, स्कूल-कॉलेजों में शिकायत तंत्र, साइबर उत्पीड़न पर कार्रवाई और पीड़िता की पहचान व गरिमा की रक्षा ये सभी महिला सुरक्षा के वास्तविक हिस्से हैं।
और समाज की भूमिका? वह भी उतनी ही बड़ी है। जब किसी लड़की का पीछा किया जा रहा हो और आसपास खड़े लोग तमाशा देखते रहें, जब सोशल मीडिया पर अश्लील टिप्पणी को “मजाक” कहकर टाल दिया जाए, जब पीड़िता से ही सवाल पूछे जाएं । तब अपराध केवल एक व्यक्ति नहीं करता, समाज की चुप्पी भी अपराधी को जगह देती है।
इसलिए बेटियों से सिर्फ यह मत कहिए कि सावधान रहना। अपने बेटों से भी कहिए- सम्मान करना।
आज जरूरत है प्रशासन से की कार्रवाई तेज हो, आज जरूरत है कि पुलिस शिकायत को गंभीरता से ले और जरूरत है समाज से की वह चुप न रहे।
क्योंकि सच यह है कि दानव किसी कहानी में नहीं है। वह उस मानसिकता में जिंदा है जो महिला को इंसान से पहले वस्तु समझती है, उसकी ना को चुनौती समझती है और कानून से बच निकलने को अपनी ताकत मानती है।
बेटियों को डराकर सुरक्षित रखना सुरक्षा नहीं है।
ऐसा समाज बनाना सुरक्षा है, जहां बेटी बेखौफ होकर घर से निकले और उसे यह चिंता न करनी पड़े कि उसकी आजादी किसी की विकृत मानसिकता का शिकार बन जाएगी।
बेखौफ मत घूमना- यह बेटी को दी जाने वाली चेतावनी नहीं होनी चाहिए।
बेखौफ घूमो, क्योंकि समाज तुम्हारे साथ है यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
लेखक — ज्योति शर्मा प्रधान संपादक,ज्ञान गुण सागर समाचार पत्र, सागर(म.प्र.)








